भ्रामरी प्राणायाम: तनाव और चिंता कम करने के साथ मन को शांत और एकाग्र करने का सरल अभ्यास
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव, चिंता, बेचैनी और लगातार चलते विचारों के कारण मन को शांत रखना कई बार मुश्किल हो जाता है। भ्रामरी प्राणायाम की सही विधि और लाभ।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- साइंटिफिकली वैलिडेड गाइड जो तुरंत दैनिक दिनचर्या में लागू की जा सकती है।
- मानसिक तनाव कम करने, ऑक्सीजन स्तर सुधारने और नाड़ी शुद्धि में सहायक।
- नीचे दिए गए विजुअल टाइमर से तुरंत अभ्यास की सही विधि सीखें।
भ्रामरी प्राणायाम: तनाव और चिंता कम करने के साथ मन को शांत और एकाग्र करने का सरल अभ्यास
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव, चिंता, बेचैनी और लगातार चलते विचारों के कारण मन को शांत रखना कई बार मुश्किल हो जाता है। ऐसे समय में योग और प्राणायाम के कुछ सरल अभ्यास मन को थोड़ी देर के लिए ठहरने और खुद पर ध्यान देने का अवसर देते हैं।
भ्रामरी प्राणायाम ऐसा ही एक अभ्यास है। इसमें सांस छोड़ते समय भौंरे जैसी गूंजने वाली ध्वनि की जाती है। इस ध्वनि और उसके कंपन पर ध्यान लगाने से मन को शांत और शरीर को रिलैक्स करने में मदद मिल सकती है।
भ्रामरी प्राणायाम करने से पहले
भ्रामरी का अभ्यास किसी शांत और आरामदायक स्थान पर करना बेहतर रहता है, ताकि आपका ध्यान बार-बार बाहर की आवाजों और गतिविधियों की तरफ न जाए।
बैठने के लिए सिद्धासन लिया जा सकता है। अगर सिद्धासन आपके लिए सहज नहीं है तो किसी आरामदायक स्थिति में बैठें। सबसे जरूरी बात है कि कमर और गर्दन सीधी रहें और शरीर पर अनावश्यक तनाव न हो।
अभ्यास शुरू करने से पहले कुछ देर शांत बैठें और अपनी सांसों को सामान्य होने दें। इसके बाद कुछ गहरी और लंबी सांसें लेकर भ्रामरी शुरू की जा सकती है।
भ्रामरी प्राणायाम की सही विधि
भ्रामरी में षण्मुखी मुद्रा का प्रयोग किया जाता है। इसमें दोनों हाथों की उंगलियों को चेहरे के आसपास इस तरह रखा जाता है कि कान और आंखों के आसपास का क्षेत्र सहज रूप से बंद हो सके।
कानों को बंद करते समय एक बात विशेष रूप से ध्यान रखें—अंगूठे को कान के अंदर नहीं डालना है। कान के बाहर मौजूद उभार पर हल्का दबाव देकर कानों को बंद किया जाता है।
आंखों के ऊपर भी जोर से दबाव नहीं डालना चाहिए। उंगलियां केवल अपनी जगह पर रहें और चेहरा बिल्कुल सहज रहे।
इसके बाद:
- धीरे-धीरे गहरी सांस अंदर लें।
- सांस छोड़ते समय होंठ बंद रखें।
- भौंरे जैसी गहरी और लगातार गूंजने वाली ध्वनि निकालें।
- आवाज को एक समान रखें; उसे बीच में अचानक तेज या धीमा न करें।
- अंत में ध्वनि को अचानक बंद करने के बजाय धीरे-धीरे समाप्त करें।
इस तरह सांस छोड़ने की पूरी प्रक्रिया के दौरान आपका ध्यान उस गुंजन और उसके कंपन पर बना रहता है।
दांतों और मुंह की स्थिति का रखें ध्यान
भ्रामरी करते समय एक छोटी-सी गलती भी अभ्यास को असहज बना सकती है।
दांतों को आपस में कसकर नहीं मिलाना चाहिए। उनके बीच हल्का सा अंतर रखें। होंठ आराम से बंद रहें और जबड़े को बिल्कुल न कसें।
जीभ को भी सहज स्थिति में रखें। इसका उद्देश्य केवल इतना है कि गुंजन करते समय मुंह और चेहरे का क्षेत्र तनावमुक्त रहे और ध्वनि स्वाभाविक रूप से निकल सके।
आवाज कैसी होनी चाहिए?
भ्रामरी की आवाज बहुत तेज या बनावटी नहीं होनी चाहिए। यह भौंरे की तरह गहरी, स्थिर और लगातार गूंजने वाली होनी चाहिए।
एक बार आवाज शुरू करने के बाद उसकी गति और स्वर को बार-बार बदलने की जरूरत नहीं है। सांस खत्म होने के साथ आवाज को भी धीरे-धीरे कम करते हुए समाप्त करें।
यही धीमा समापन शरीर और मन को सक्रियता से विश्रांति की ओर ले जाने में मदद करता है।
कितनी देर तक करें?
अगर आप पहली बार भ्रामरी कर रहे हैं तो शुरुआत लगभग 5 मिनट से कर सकते हैं। अभ्यास सहज लगने लगे तो धीरे-धीरे इसे 10, 15 और 20 मिनट तक बढ़ाया जा सकता है।
जरूरी यह नहीं है कि आप शुरुआत से ही ज्यादा देर तक करें। सही विधि और नियमित अभ्यास ज्यादा महत्वपूर्ण है।
विद्यार्थी या ऐसे लोग जिनका मन पढ़ाई या काम के दौरान बार-बार भटकता है, वे भी अपनी दिनचर्या में कुछ समय इस अभ्यास के लिए निकाल सकते हैं। कुछ देर शांत होकर भ्रामरी करने से मन को दोबारा एकाग्र करने में मदद मिल सकती है।
अभ्यास के बाद तुरंत आंखें न खोलें
भ्रामरी खत्म करने के बाद अचानक हाथ नीचे करके आंखें खोलना सही तरीका नहीं है।
कुछ देर आंखें बंद रखकर सामान्य सांस पर ध्यान दें और शरीर में महसूस हो रही शांति को महसूस करें। हाथों को घुटनों पर रखकर कुछ समय शांत बैठें।
इसके बाद दोनों हथेलियों को आपस में रगड़कर गर्म करें और उन्हें बंद आंखों पर रखें। फिर हथेलियों के अंदर ही धीरे-धीरे आंखें खोलें।
इस तरह अभ्यास से बाहर आने पर शरीर और मन को सामान्य अवस्था में लौटने का समय मिलता है।
भ्रामरी से क्या लाभ महसूस हो सकते हैं?
भ्रामरी प्राणायाम को मुख्य रूप से मन को शांत करने और शरीर को विश्रांति देने वाले अभ्यास के रूप में किया जाता है। इसके दौरान होने वाली गुंजन पर ध्यान लगाने से बाहरी विचारों से ध्यान हटाकर वर्तमान क्षण पर ध्यान केंद्रित करना आसान हो सकता है।
नियमित अभ्यास से व्यक्ति को तनाव और मानसिक बेचैनी के समय खुद को शांत करने में सहायता मिल सकती है। साथ ही यह एकाग्रता और मानसिक स्थिरता के अभ्यास के रूप में भी उपयोगी हो सकता है।
हालांकि हर व्यक्ति का अनुभव अलग हो सकता है, इसलिए इसे किसी बीमारी का निश्चित इलाज मानने के बजाय योग के एक सहायक अभ्यास के रूप में देखना बेहतर है।
एक जरूरी बात
मानसिक तनाव या चिंता को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। योग और प्राणायाम मानसिक शांति के लिए सहायक हो सकते हैं, लेकिन अगर किसी व्यक्ति को लंबे समय से गंभीर चिंता, अवसाद या अन्य मानसिक परेशानी है और उसका असर रोजमर्रा के जीवन पर पड़ रहा है, तो योग के साथ योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।